अजित पवार की अंतिम पहचान उनके हाथ में बंधी उस घड़ी से हुई, जो न केवल उनका व्यक्तिगत शौक था, बल्कि उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी था. जिस शख्स ने ताउम्र वक्त की पाबंदी और अनुशासन को अपनी राजनीति का हथियार बनाया, नियति ने उनके शव की पहचान भी वक्त बताने वाली उसी घड़ी से कराई.