कौन हैं पद्म श्री पजानिवेल? PM मोदी को किया साष्टांग प्रणाम, देखें प्रधानमंत्री का रिएक्शन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को 66 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. इस दौरान पद्मश्री से नवाजे गए पुडुचेरी के के. पजानिवेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साष्टांग प्रणाम किया, जिसके बाद से यह घटना चर्चा में बनी हुई है. बता दें कि पुडुचेरी के प्रसिद्ध सिलंबम गुरु पजानिवेल को देश में पारंपरिक मार्शल आर्ट में अहम योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है.

राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में जैसे ही सिलंबम गुरु पजानिवेल को पुरस्कार के लिए बुलाया गया. उन्होंने सम्मान लेने से पहले साष्टांग (जमीन पर लेटकर) की मुद्रा में पीएम मोदी को प्रणाम किया. वहीं यह देखते ही पीएम मोदी ने आगे बढ़कर तुरंत उन्हें उठाया और हाथ पकड़ लिया. इसके बाद पजानिवेल राष्ट्रपति की तरफ बढ़े. यहां उन्होंने राष्ट्रपति के चरण स्पर्श किए और फिर पद्म श्री सम्मान को ग्रहण किया.

कौन हैं के. पजानिवेल?

पद्म श्री से सम्मानित के. पजानिवेल का जन्म 30 जनवरी 1973 को पुडुचेरी के पूरनंकुप्पम में हुआ था. पजानिवेल ने मास्टर राजाराम के मार्गदर्शन में सिलंबम की शुरुआत की थी. जिसके बाद कई दशकों के अपने करियर में उन्होंने भारत से लेकर विदेशों तक इस प्राचीन तमिल मार्शल आर्ट के संरक्षण, प्रचार और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

पजानिवेल ने कई छात्रों को निशुल्क प्रशिक्षण दिया है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह पारंपरिक कला अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहे. इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शनों, प्रस्तुतियों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से सिलंबम का प्रतिनिधित्व भी किया.

संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित

इससे पहले पजानिवेल को 2023 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वहीं 2012 में पुडुचेरी सरकार द्वारा कलाइमामणि पुरस्कार, 2004 में नेहरू युवा केंद्र द्वारा सर्वश्रेष्ठ युवा पुरस्कार और 2002 में सिलंबम अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था.

पद्म श्री सम्मान मिलने पर के. पजानिवेल ने बताया कि वे इस सम्मान को चार दशकों से अधिक समय से तमिल विरासत को विश्व स्तर पर पहुंचाने के लिए प्रोत्साहन मानते हैं. उन्होंने कहा कि सिलंबम को स्कूलों में भी पढ़ाया जाना चाहिए.

क्या है सिलंबम?

सिलंबम तमिलनाडु की एक प्राचीन और पारंपरिक युद्ध कला है. इसकी उत्पत्ति लगभग 5,000 साल पुरानी मानी जाती है. सिलंबम शब्द तमिल भाषा के दो शब्दों सिलम (पहाड़) और बाम (बांस) से मिलकर बना है. इसमें एक विशेष प्रकार की बांस की लचीली छड़ी (लाठी) का उपयोग मुख्य हथियार के रूप में किया जाता है.

प्राचीन तमिल संगम साहित्य में भी जिक्र

इसका जिक्र प्राचीन तमिल संगम साहित्य (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में भी मिलता है. चोल, चेर और पांड्य राजाओं के समय से ही इसका उपयोग आत्मरक्षा और युद्ध के लिए किया जाता रहा है. इसमें लाठी को तेजी से घुमाने, हवा में कलाबाजी दिखाने और बेहद फुर्तीले पैरों की चाल का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी कई तकनीकें जानवरों की चालों, जैसे- सांप, बंदर और बाज से प्रेरित हैं.

सिलंबम में बांस की लाठी के अलावा, तलवार, कटार, ढाल और ‘अरुवा’ (हंसिया) जैसे हथियारों का भी प्रशिक्षण देते हैं. आजादी की लड़ाई के दौरान तमिल राजाओं, जैसे वीरपांडिया कट्टाबोम्मन ने अंग्रेजों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया था. इससे खौफ से अंग्रेजों ने 18वीं सदी के अंत में इसके अभ्यास पर प्रतिबंध लगा दिया था.

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