
Randeep Hooda Career Story: अपनी एक्टिंग से हर किरदार को खास बनाने वाले बॉलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा आज (20 अगस्त) अपना 50वां जन्मदिन मना रहे हैं. ‘हाईवे’ का महाबीर हो, ‘सरबजीत’ का दर्द या फिर ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ के लिए उनका हैरतअंगेज बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन, रणदीप ने हमेशा लीक से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई है. रणदीप के लिए मायानगरी मुंबई का सफर इतना सीधा नहीं था. कहते हैं न कि ‘सोना तपकर ही कुंदन बनता है’. रणदीप के शुरुआती दिनों का एक ऐसा अनसुना किस्सा है, जो आज भी लोगों को हैरान कर देता है.
दरअसल ये किस्सा जुड़ा है जाने-माने फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा के साथ, जो एक दौर में रणदीप को कोई दूसरा काम न करने के बदले हर महीने 35 हजार रुपये जेब खर्च के लिए देते थे.
‘मॉनसून वेडिंग’ से खुली किस्मत, फिर रामू की पड़ी नजर
साल 2001 में आई मीरा नायर की फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ से रणदीप ने अपने करियर की शुरुआत की थी. फिल्म की इंटरनेशनल लेवल पर खूब वाहवाही हुई, लेकिन मुंबई में पैर जमाने के लिए रणदीप को तब भी खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी. उसी दौरान उनकी मुलाकात उस वक्त के सबसे बड़े और हिट डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा से हुई. रामू को रणदीप का देसी ठाठ, आंखों की चमक और रफ-एंड-टफ अंदाज पहली ही नजर में भा गया. उन्हें लगा कि इस लड़के में एक बड़ा स्टार बनने का पूरा माद्दा है और उन्होंने रणदीप को एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट के लिए साइन करने का मन बना लिया.
‘हाथ पर हाथ धरकर बैठने’ की अनोखी शर्त
रामू चाहते थे कि रणदीप जब भी पर्दे पर आएं, तो सीधे धमाका हो. इसी सोच के साथ उन्होंने रणदीप के सामने एक अजीबोगरीब शर्त रख दी. उन्होंने कहा, “मैं तुम्हारे साथ एक बहुत बड़ी फिल्म बना रहा हूं, लेकिन जब तक यह फिल्म पूरी बनकर पर्दे पर नहीं आती, तब तक तुम किसी भी दूसरे डायरेक्टर के साथ काम नहीं करोगे.”
अब रणदीप के सामने सबसे बड़ी उलझन यह थी कि अगर वो काम नहीं करेंगे, तो मायानगरी मुंबई में दाल-रोटी का जुगाड़ कैसे होगा? फ्लैट का किराया और रोजमर्रा का खर्च कहां से आएगा? इस पर राम गोपाल वर्मा ने बीच का रास्ता निकाला और तय किया कि वो रणदीप को हर महीने 35 हजार रुपये देंगे, ताकि उन्हें पैसों की तंगी न हो. उस जमाने में एक नए कलाकार के लिए 35 हजार की रकम किसी बड़ी लॉटरी से कम नहीं थी.
3 साल बाद प्रोजेक्ट डिब्बाबंद
रणदीप लगातार रामू के ऑफिस जाते रहे, अपनी फिटनेस पर मेहनत करते रहे और हर महीने उनके खाते में 35 हजार रुपये आते रहे. ये सिलसिला महीने-दो महीने नहीं, बल्कि पूरे 3 साल तक चलता रहा. लेकिन जैसा कि कहते हैं, ‘ऊंची दुकान, फीका पकवान’, 3 साल के लंबे इंतजार के बाद वो फिल्म कभी शुरू ही नहीं हो पाई और आखिरकार ठंडे बस्ते में चली गई. एक जुनूनी एक्टर के करियर के वो तीन सबसे कीमती साल बिना किसी शूटिंग के निकल गए. हालांकि, बाद में रामू ने अपनी 2005 की गैंगस्टर फिल्म ‘डी’ (D) में रणदीप को लीड रोल दिया, जहां से उनकी एक्टिंग का डंका पूरी इंडस्ट्री में बजा.
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रणदीप ने बाद में एक इंटरव्यू में हंसते हुए बताया था कि घर बैठे पैसे मिलना दूर से भले ही अच्छा लगता हो, लेकिन कैमरे के सामने आने के लिए तड़प रहे एक भूखे कलाकार के लिए 3 साल तक खाली बैठना किसी कैद जैसा था. जन्मदिन के मौके पर रणदीप का यह किस्सा यही बयां करता है कि सब्र का घूंट पीकर ही इंसान अपनी असली मंजिल तक पहुंचता है.