चीन के निवेश पर भारत की स्क्रूटनी! एक साल में सिर्फ एक चीनी FDI को मिली मंजूरी

डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में भारत सरकार ने चीन से आए एफडीआई के केवल एक प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसका कुल मूल्य मात्र 1 करोड़ रुपए है. इसके विपरीत, हांगकांग से आए 13 एफडीआई प्रस्तावों को हरी झंडी दी गई, जिनकी कुल कीमत 610.42 करोड़ रुपए है. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण चीनी निवेश पर कड़ी निगरानी की नीति लगातार बनी हुई है. आइए विस्तार से समझते हैं कि प्रेस नोट 3 (Press Note 3) के तहत क्या नियम हैं, किस देश का भारत में सबसे ज्यादा FDI मंजूर हुआ और इसके आर्थिक मायने क्या हैं.

1 चीनी एफडीआई को मंजूरी

भारत ने पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के केवल एक एफडीआई प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसका मूल्य एक करोड़ रुपए था. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार हांगकांग से आए 610.42 करोड़ रुपए के 13 आवेदनों को मंजूरी दी गई. ये मंजूरियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से निवेश के लिए अप्रैल 2020 से पूर्व सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है. ऐसा डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) के ‘प्रेस नोट 3’ के तहत किया गया. यह उपाय कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के अधिग्रहणों को रोकने के लिए किया गया था.

कुल 10,292.67 करोड़ के एफडीआई को मंजूरी

  1. डीपीआईआईटी के आंकड़ों के अनुसार कुल मिलाकर सरकार ने अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के दौरान 10,292.67 करोड़ रुपये (1.18 अरब अमेरिकी डॉलर) मूल्य के 63 एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) प्रस्तावों को मंजूरी दी है.
  2. मूल्य के लिहाज से सिंगापुर एफडीआई प्रस्तावों के सबसे बड़े स्रोत के रूप में उभरा, जिसके 3,259.88 करोड़ रुपये के पांच प्रस्तावों को मंजूरी मिली.
  3. इसके बाद ब्रिटेन का स्थान रहा, जिसके 2,477.67 करोड़ रुपये के पांच प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, तथा थाईलैंड के 1,600 करोड़ रुपये के दो प्रस्तावों को स्वीकृति मिली.
  4. भारत को सीधे चीन से कभी भी महत्वपूर्ण निवेश प्राप्त नहीं हुआ है. अप्रैल 2000 और मार्च 2026 के बीच भारत में कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में चीन का स्थान 23वां है, जिसकी हिस्सेदारी केवल 0.32 प्रतिशत है.

प्रेस नोट 3 के नियमों में ढील, लेकिन चीन के लिए नहीं

मार्च में, सरकार ने प्रेस नोट 3 के तहत कुछ नियमों में ढील दी थी. इसके तहत, जमीन से सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश के लिए ‘ऑटोमैटिक रूट’ (बिना सरकारी मंज़ूरी के निवेश) की इजाजत दी गई, बशर्ते उनकी ‘बेनिफिशियल ओनरशिप’ (वास्तविक मालिकाना हक) 10 प्रतिशत से ज़्यादा न हो और सेक्टर से जुड़ी सीमाएं व अन्य शर्तें पूरी हों.

हालांकि, यह ढील चीन, हांगकांग या भारत के साथ ज़मीन से सीमा साझा करने वाले किसी भी अन्य देश में रजिस्टर्ड कंपनियों पर लागू नहीं होती है. ऐसे निवेश के लिए अभी भी सरकार की मंजूरी लेना जरूरी है. भारत की ज़मीन से सीमा चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, म्यांमार और अफगानिस्तान से लगती है.

चीन से FDI सीमित ही रहा है

DPIIT के आंकड़ों के मुताबिक, चीन कभी भी भारत में FDI का बड़ा स्रोत नहीं रहा है. अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच, भारत में कुल FDI इक्विटी निवेश में चीन का हिस्सा सिर्फ 0.32 प्रतिशत था, जो 2.51 अरब डॉलर (16,162.25 करोड़ रुपए) के बराबर है. इस तरह निवेश करने वाले देशों की सूची में चीन 23वें स्थान पर रहा.

इसी दौरान हांगकांग 15वें स्थान पर रहा, जिसने कुल FDI इक्विटी निवेश में 4.91 अरब डॉलर (31,220.30 करोड़ रुपये) या 0.62 प्रतिशत का योगदान दिया. 2024-25 में भी यही ट्रेंड देखने को मिला, जब भारत ने चीन के सिर्फ एक FDI प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसकी कीमत 28.71 करोड़ रुपए थी. उस वित्त वर्ष के दौरान, सरकारी रूट के तहत 39,758 करोड़ रुपए (4.72 अरब डॉलर) के 82 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिनमें हांगकांग के 1,225.28 करोड़ रुपए मूल्य के 11 प्रस्ताव शामिल थे.

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