
हुमायूं की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि एक बार भारत का राज-पाट खोने के बाद उसने फिर वापसी की और वालिद बाबर द्वारा डाली सल्तनत की बुनियाद पर अगली नस्लों को मुगल वंश का राज कायम रखने का रास्ता साफ किया. उसकी कुल 48 साल की जिंदगी का ज़्यादातर हिस्सा युद्धों और भाइयों की बगावत से जूझते बीता. शेरशाह सूरी से चौसा की जंग में हार बाद भागते हुमायूं को जिस भिश्ती ने गंगा में डूबने से बचाया उसे अपना राज वापस पाने के बाद वादे के मुताबिक एक दिन के लिए दिल्ली के तख्त पर बिठाया.
उस भिश्ती ने अपनी मशक के चमड़े के सिक्के चलाए थे. हुमायूं वो खुशनसीब था, जिसकी जिंदगी की खातिर वालिद बाबर ने दुआ करते हुए उसके पलंग के चक्कर लगा बीमारी अपने ऊपर ले ली थी. पढ़िए मुगल वंश के दूसरे बादशाह हुमायूं से जुड़े किस्से.
बाप ने बेटे के लिए जिंदगी कर दी कुर्बान
30 दिसंबर 1530 को महज 22 साल की उम्र में हुमायूं दिल्ली के तख़्त पर बैठा. हालांकि उसके सिर ताज सजने की कहानी मुगल वंश की अगली नस्लों से खासी जुदा रही. अकबर की जिंदगी में ही उसके बेटे जहांगीर ने तख़्त के लिए बगावत कर दी थी. जहांगीर ने जैसा बोया ,वैसा ही तब काटा जब शाहजहां ने उसके खिलाफ़ मोर्चा खोला. औरंगज़ेब ने तो सबको पीछे छोड़ा और बाप शाहजहां को उसकी जिंदगी के आखिरी साढ़े छह साल आगरा के किले में कैद रखा. लेकिन भारत में मुगल वंश की बुनियाद रखने वाले बाबर के अपने बेटे हुमायूं से रिश्ते बाप-बेटे की सच्ची मोहब्बत के थे, जिसमें बाप को तख़्त से ज्यादा बेटे की जिंदगी कीमती लगी और बेटे की जिंदगी को बचाने के लिए उसकी विपदाएं-बीमारियां अपने सिर ओढ़ लीं. बाप की दुआओं से बेटा चंगा हुआ. उसने राज-काज संभाला. दूसरी तरफ बाप बीमार हुआ और चंद दिनों के भीतर दुनिया से रुख़सत हो गया.
मुगल बादशाह बाबर.
कौन सा पत्थर जो बेटे की बराबरी पर तुल सके !
हुमायूंनामा में गुलबदन बेगम के लिखे मुताबिक सम्भल में रिहाइश के दौरान हुमायूं बुरी तरह बीमार हो गया. बेटे की बीमारी की खबर मिलते ही माहेम बेगम उससे मिलने के लिए रवाना हुईं. मथुरा में दोनों की मुलाकात हुई. फिर हुमायूं को आगरा लाया गया. हुमायूं बेहद कमजोर हो चुके थे. बीच-बीच में होश आने पर गुलबदन बेगम और अन्य बहनों की ओर देख कुछ कहते और फिर आंखें मुंद जातीं.
पिता बादशाह बाबर को देख और व्याकुल-परेशान दिखने लगे. हकीमों ने इलाज शुरू किया. लेकिन दवाइयां बेअसर थीं. हुमायूं के बचने की उम्मीद कम होती जा रही थी. ऐसे में हर आम-खास को ऊपर वाले से ही उम्मीद होती है. बेटों में बाबर को हुमायूं से सबसे ज्यादा लगाव था. उसने मौलानाआं से सलाह की. कुरबानी की बात चलाई. तज़बीज पेश हुई कि सबसे कीमती रत्न कोहिनूर को मजहबी मकसदों के लिए भेंट कर दिया जाए. बाबर ने इसे खारिज किया. सवाल किया कि वो कौन सा पत्थर है, जो मेरे बेटे की बराबरी पर तुल सके? कीमत मैं चुकाऊंगा अपनी जिंदगी देकर.
हुमायूं.
बीमार बेटे के पलंग के वे तीन चक्कर
बाबर की आत्मकथा “बाबरनामा” और गुलबदन बेगम के हुमायूंनामा में ब्यौरे के मुताबिक बेटे की जिंदगी के लिए खुद को कुर्बान करने के संकल्प को बाबर ने एक पहुंचे हुए पीर की देख-रेख में पूरा किया. बीमार हुमायूं के पलंग की बाबर ने तीन परिक्रमा कीं और अल्लाह से दुआ मांगी कि अगर जान का बदला जान है तो मेरी जान लेकर बेटे की जान बख्श दे. चमत्कारिक तौर पर तभी बाबर को बुखार का अहसास हुआ और वो चिल्ला पड़ा कि दुआ कुबूल हुई. फिर कह पड़ा, “मैंने अपने ऊपर ले लिया. बर्दाशतम!बर्दाशतम! गुलबदन जो बाबर की बेटी थी, ने हुमायूंनामा में लिखा है, “उसी दिन बादशाह बीमार हो गए और हुमायूं ने नहाने के बाद बाहर आकर दरबार किया.” बाबर दो – तीन महीने रोग शैय्या पर रहा. कुछ इतिहासकार दो-तीन सप्ताह बताते हैं.
गुलबदन के मुताबिक, “ज्यों-ज्यों हुमायूं हरा होता गया, त्यों-त्यों बाबर छीजता गया. ” सेहत सुधरने के साथ हुमायूं कालिंजर चला गया. दूसरी तरफ बीमार बाबर की हालत दिनों-दिन बिगड़ती गई.खबर पाने पर हुमायूं की वापसी हुई.
बाबर की पहली पसंद इकलौता दामाद
हुमायूं के लिए बेपनाह प्यार के बाद भी क्या बाबर दिल्ली की गद्दी उसे सौंपना चाहता था? बाबरनामा में दर्ज घटनाएं बताती हैं कि पहले बाबर हिंदुस्तान को अपने इकलौते दामाद मुहम्मद जमान मीरजा को देना चाहता था जो कि मासूमा का पति था. अप्रैल 1529 में बाबर ने उसे राजछत्र भेंट किया था. दूसरी ओर हुमायूं की मां माहेम बेगम अपने बेटे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत की चाहत रखती थी.
माहेम को हुमायूं के प्रति बाबर की बेरुखी का अहसास हो गया था. माहेम ने हुमायूं को काबुल से हिंदुस्तान बुला कर एक बार फिर बाबर का खोया भरोसा हासिल करने की सलाह दी. असलियत में 1527 में हुमायूं दिल्ली का खजाना हथिया काबुल रवाना होकर वालिद को नाराज कर चुका था. लेकिन वक्त हुमायूं के माफिक था. उसकी बीमारी ने पिता बाबर के सारे गिले-शिकवे दूर कर सिर पर ताज सजने का रास्ता साफ कर दिया. गुलबदन बेगम के मुताबिक उसके पिता बाबर की बीमारी में कोई दवा-कोशिश काम नहीं आ रही थी.
बाबर को अपने अंत का अहसास हो चुका था. अमीरों को बुला बाबर ने कहा कि बहुत दिनों से मेरी ख्वाहिश थी कि हिंदुस्तान की बादशाहत हुमायूं मिर्जा को सौंप जरअफशां बाग में तनहा आराम करूं. खुदा ने वो मौका नहीं दिया. अब अपनी बीमारियों से दुखी होकर वसीयत कर रहा हूं कि हुमायूं को हमारे स्थान पर समझें. उनका भला करने में कमी न करें और उनके एक राय रहें. हुमायूं, तुम्हारे भाइयों, सब संबंधियों और सभी रियाया को तुम्हें और खुद को अल्लाह को सौंपता हूं. बाबर की ये बातें सुन लोग रो पड़े. तीन दिन के अंतराल पर 26 दिसंबर 1930 को बाबर का निधन हो गया.
हुमायूं की उदारता पड़ी उसे भारी
दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद हुमायूं ने अपने भाइयों कामरान मिर्ज़ा, अस्करी मिर्ज़ा और हिंदाल मिर्ज़ा को कई बड़े प्रांत सौंप दिए. लेकिन उसकी इस उदारता ने भाइयों की ख्वाहिशें और बढ़ाईं तथा उन्होंने कदम-कदम पर बगावत कर उसे परेशान कर दिया.
इतिहासकारों की नज़र में हुमायूं की उदारता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी. अपने शासन के शुरुआती दौर में हुमायूं ने कालिंजर तथा गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के विरुद्ध अभियान चलाए. चंपानेर सहित कई इलाकों पर अधिकार किया. लेकिन ये कामयाबियां स्थायी नहीं थीं. इसी दौर में बिहार में अफगान सरदार शेरशाह सूरी अपनी ताकत का विस्तार कर रहा था.
26 जून 1539 को चौसा (वर्तमान बिहार) में हुमायूं और शेरशाह की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ जिसमें हुमायूं को करारी हार मिली. मुगल सेना बिखर गई. अन्य इतिहासकारों के साथ ही गुलबदन बेगम ने भी लिखा है कि गंगा पार करने की कोशिश में हुमायूं नियंत्रण खो बैठा. तेज धारा में उसके डूबने की नौबत आ गई. तभी एक भिश्ती मदद के लिए देवदूत बन आगे आया. अपनी फुलाई हुई मशक का सहारा देकर हुमायूँ को नदी पार करा उसकी जान बचाई. अहसानमंद हुमायूं ने उससे वादा किया था कि जब राज – पाट वापस पाऊंगा, तो तुम्हें एक दिन के लिए गद्दी सौंपूंगा.
मुगलों की जंग. AI Generated
दूसरी हार फिर 15 साल हिंदुस्तान से दूर
चौसा की हार के बाद हुमायूं ने एक बार फिर सेना जुटानी शुरू की. 17 मई 1540 को कन्नौज में उसका फिर शेरशाह से युद्ध हुआ. लेकिन दूसरी बार भी वो पराजित हुआ. इस बार अगले पंद्रह वर्षों के लिए उसे हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा. इस दौरान उसने सिंध, थार मरुस्थल और ईरान तक कठिन यात्राएं कीं. कई मौकों पर खाना तक नसीब नहीं था.
1542 में सिंध के अमरकोट (वर्तमान उमरकोट, पाकिस्तान) में राजपूत शासक राणा वीरसाल ने उन्हें शरण दी. यहीं 15 अक्टूबर 1542 को उसके पुत्र जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का जन्म हुआ जो आगे मुगल वंश का सबसे कामयाब बादशाह बना. हालांकि, अकबर के जन्म के समय हुमायूं के दुर्दिन थे और उसकी जेबें खाली थीं. भटकते हुमायूं को फारस के शाह तहमास्प प्रथम ने शरण दी और यहीं से उसके अच्छे दिनों की वापसी शुरू हुई. फारसी सेना की सहायता से उसने कंधार और काबुल को फिर से जीता.
भाइयों के लिए बेहद उदार बराबर उनसे धोखा खाता रहा. कामरान ने सबसे ज्यादा साजिशें रचीं. हुमायूं ने फिर भी उसे मृत्युदंड नहीं दिया. सिर्फ उसे अंधा कर मक्का भेज दिया. 1555 में हुमायूं ने बैरम खां की मदद से सरहिंद के युद्ध में अफगानों को पराजित किया. 23 जुलाई 1555 को उसने एक बार फिर दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा कर लिया.
भिश्ती को नहीं भूला
हिंदुस्तान की बादशाहत की अपनी दूसरी पारी में हुमायूं को निजाम नाम के उस भिश्ती की जिसने गंगा में डूबने से उसे बचाया था, की याद थी. उस भिश्ती को एक दिन का बादशाह बनाने का वादा भी वह नहीं भूला था. गुलबदन बेगम ने “हुमायूंनामा” में इस प्रसंग में लिखा है, “चौसा के युद्ध में जब हुमायूं गंगाजी पार करते समय डूब रहा था , तब नाजिम नामक भिश्ती ने उसे बचाया था. ईनाम के तौर पर हुमायूं ने उस भिश्ती को एक दिन के लिए तख़्त पर बिठाया था और उसने अपनी मशक के चमड़े के सिक्के चलाये थे.
“तबक़ात-ए-अकबरी में भी हुमायूं को भिश्ती द्वारा बचाए जाने और उसे सम्मान देने का उल्लेख मिलता है. “अकबरनामा ” में अबुल फ़ज़्ल ने भी इसका उल्लेख किया है कि हुमायूं ने अपनी जिंदगी बचाने वाले को काफी इज्ज़त बख़्शी थी. आधुनिक इतिहासकार भी भिश्ती द्वारा हुमायूं की जान बचाने और बाद में बादशाह द्वारा उसे ईनाम-इकराम देने को सही मानते हैं लेकिन एक दिन की बादशाहत सौंपने और चमड़े के सिक्के चलाए जाने को लोककथा का हिस्सा मानते हैं. इस प्रसंग में जिस हद तक भी प्रमाणिकता हो लेकिन इससे हुमायूं की उदार शख्सियत उजागर होती है कि अपनी मदद करने वालों को वह कभी नहीं भूलता था.
सीढ़ियों से गिर जान गंवाई
दिल्ली के पुराने किले में स्थित शेर मंडल में हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनाया था. गुलबदन बेगम ने “हुमायूंनामा” में लिखा , ” 24 जनवरी 1556 को जुमा के दिन उगते शुक्र को देखते हुए सीढ़ी उतर रहे थे कि मुअज्जिन ने अज़ान पुकारी और सीदी अली के कहे के मुताबिक जैसा कि उनका मिजाज था, वे घुटनों के बल झुके और लड़खड़ाकर गिर पड़े. तीन दिन बाद 27 जनवरी को उनकी मौत हो गई. सीदी अली की सलाह से इस हादसे को तब तक छिपाए रखा गया , जब तक लाहौर में बैरम खान ने अकबर को राजगद्दी पर बिठा खुतबा नहीं पढ़ा दिया था. ” इतिहासकार हुमायूं को ऐसा शासक बताते हैं जो विद्वान और साहित्यप्रेमी था . उसकी ज्योतिष में गहरी आस्था थी. उसे उदार और क्षमाशील बताया गया . हालांकि इस उदारता के चलते उसे बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. बाबर ने अगर मुगल साम्राज्य की बुनियाद रखी तो उसे कायम रखने का कठिन काम हुमायूं ने किया. इसी के चलते आगे अकबर की राह आसान हुई.
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