Tata Sons जैसी देश की सबसे बड़ी कॉर्पोरेट होल्डिंग कंपनी को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ (NBFC – Upper Layer) के रूप में वर्गीकृत किए जाने के बाद यह शब्द अचानक सुर्खियों में आ गया है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई नॉन-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) साइज, इंपैक्ट और वित्तीय ताकत में देश के बड़े-बड़े बैंकों के बराबर पहुंच जाती है, तो आरबीआई उस पर कैसे नकेल कसता है?
आखिर क्या होती है ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ (NBFC-UL), आरबीआई ने इसके लिए इतने चौंकाने वाले और कड़े नियम क्यों बनाए हैं, और इसमें शामिल कंपनियों पर बैंकों जैसे कानून क्यों लागू होते हैं? आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं
NBFC-UL को लेकर आरबीआई का आदेश
भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस को अपर लेयर की नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) की लिस्ट में बरकरार रखा. केंद्रीय बैंक ने कहा कि होल्डिंग कंपनी को सूची में शामिल किए जाने से उसके एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन को लौटाने के लंबित आवेदन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. आरबीआई ने आकार आधारित रेगुलेशन रूपरेखा के तहत अपर लेयर की एनबीएफसी की नई लिस्ट जारी की. इसमें 17 कंपनियां शामिल हैं. इस व्यवस्था के तहत प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण नॉन-बैंकिंग लेंडर्स और कोर इंवेस्टमेंट कंपनियों (सीआईसी) पर अधिक कड़े नियामकीय प्रावधान लागू होते हैं.
आरबीआई ने कहा कि लिस्ट में टाटा संस प्राइवेट लि. को शामिल किया जाना उसके पंजीकरण रद्द करने के आवेदन के परिणाम को प्रभावित नहीं करेगा. फिलहाल इस आवेदन की जांच की जा रही है. 400 अरब डॉलर के टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस को पहली बार 2022 में अपर लेयर कैटेगिरी की एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया था. इस वर्गीकरण के तहत कंपनी को कड़े नियामकीय नियमों का पालन करना पड़ता है. इसमें भविष्य में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना तथा सख्त संचालन व्यवस्था, पूंजी और खुलासा आवश्यकताओं को पूरा करना शामिल है. यह व्यवस्था तबतक रहती है जब तक कि वह अपनी संरचना में बदलाव नहीं करती.
इसके बाद टाटा संस ने वित्तीय कारोबार में अपनी हिस्सेदारी कम करने और समूह के कुछ हिस्सों के पुनर्गठन के लिए कदम उठाए. कंपनी ने आरबीआई के वर्गीकरण से छूट देने का अनुरोध भी किया था. कंपनी ने उधारी कम करने और अपने वित्तीय सेवा कारोबार के पुनर्गठन के लिए भी कदम उठाए हैं, जिसमें वित्तीय परिचालन को अपनी मुख्य निवेश गतिविधियों से अलग करना शामिल है.
पारंपरिक एनबीएफसी से अलग, टाटा संस एक प्रमुख निवेशक कंपनी के रूप में काम करती है. इसका मुख्य कारोबार टाटा समूह की कंपनियों में निवेश रखना है, न कि ऋण देना. कंपनी की टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा मोटर्स, टाइटन और इंडियन होटल्स कंपनी जैसी सूचीबद्ध कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है. इसकी आय का एक बड़ा हिस्सा इन कंपनियों से मिलने वाले लाभांश से आता है.
इन कंपनियों को भी अपर लेयर में रखा
टाटा संस के अलावा सूची में अन्य कंपनियों में बुनियादी ढांचा निवेशक कंपनियां आरईसी, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन, इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन और हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (हुडको) शामिल हैं. जमा स्वीकार करने वाली एनबीएफसी में बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस तथा आवास वित्त कंपनी एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस सूची में शामिल हैं.
जमा स्वीकार नहीं करने वाली एनबीएफसी में टाटा कैपिटल और चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस के अलावा मुथूट फाइनेंस, आदित्य बिड़ला कैपिटल, एलएंडटी फाइनेंस, बजाज हाउसिंग फाइनेंस, एचबीडी फाइनेंशियल सर्विसेज लि. और पीरामल फाइनेंस शामिल हैं.
आरबीआई ने एनबीएफसी को उनके आकार, गतिविधियों और वित्तीय प्रणाली के लिए संभावित जोखिम के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा है. आधार श्रेणी (एनबीएफसी-बीएल) में छोटे एनबीएफसी आते हैं, जिनका संचालन अपेक्षाकृत सरल होता है. मध्यम श्रेणी (एनबीएफसी-एमएल) में निवेश और ऋण कंपनियां, आवास वित्त कंपनियां, बुनियादी ढांचा वित्त कंपनियां और छोटे कर्ज देने वाले संस्थान जैसी इकाइयां शामिल होते हैं.
आरबीआई का ‘स्केल-बेस्ड रेगुलेशन’ (SBR) क्या है?
साल 2018 में IL&FS और बाद में DHFL जैसे बड़े वित्तीय संकटों ने देश की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया था. ये कंपनियां बैंक नहीं थीं, लेकिन इनका नेटवर्क इतना बड़ा था कि इनके डूबने से पूरा वित्तीय तंत्र जोखिम में पड़ गया. इससे सबक लेते हुए रिजर्व बैंक ने अक्टूबर 2021 में एनबीएफसी के लिए एक नया 4-स्तरीय ढांचा पेश किया, जिसे स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (Scale-Based Regulation – SBR) कहा जाता है. आरबीआई ने एनबीएफसी को उनके आकार, जोखिम और वित्तीय प्रभाव के आधार पर पिरामिड की तरह 4 परतों (Layers) में बांटा:
- बेस लेयर: सबसे छोटी एनबीएफसी (₹1,000 करोड़ से कम एसेट साइज वाली).
- मिडिल लेयर: 1,000 करोड़ या उससे अधिक एसेट साइज वाली मध्यम एनबीएफसी.
- अपर लेयर: वे चुनिंदा शीर्ष एनबीएफसी, जिन्हें आरबीआई बेहद महत्वपूर्ण और प्रणालीगत रूप से जोखिम भरा मानता है. खास बात तो ये है कि इनका असेट साइज 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा होता है.
- टॉप लेयर: यह परत फिलहाल खाली रखी गई है. अगर अपर लेयर की किसी कंपनी का जोखिम बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो आरबीआई उसे इस टॉप कैटेगरी में डालकर अत्यंत सख्त नियम लागू कर सकता है.
अपर लेयर एनबीएफसी (NBFC-UL) क्या होती है?
‘अपर लेयर एनबीएफसी’ में वे चुनिंदा 17 से 18 एनबीएफसी शामिल की जाती हैं, जिन्हें रिजर्व बैंक एक तय मापदंड (Parametric Scoring) के आधार पर चुनता है. आरबीआई केवल कंपनी की संपत्तियों (Asset Size) को ही नहीं देखता, बल्कि निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखकर इस लिस्ट को तैयार करता है:
- सिस्टमैटिक इम्पैक्ट: अगर यह कंपनी डूबी तो देश की अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा?
- अन्य वित्तीय संस्थानों से जुड़ाव: इस कंपनी का बैंकों और म्यूचुअल फंडों के साथ कितना लेन-देन है?
- कारोबार की जटिलता: कंपनी का बिजनेस मॉडल कितना जटिल है.
आरबीआई के 5 कड़े नियम जो आपको चौंका देंगे
जब किसी एनबीएफसी को ‘अपर लेयर’ का टैग मिलता है, तो उस पर सामान्य एनबीएफसी वाले ढीले नियम लागू नहीं होते. उस पर लगभग व्यावसायिक बैंकों (Commercial Banks) जैसे कड़े नियम लागू हो जाते हैं:
- शेयर बाजार में अनिवार्य लिस्टिंग: अगर कोई एनबीएफसी अपर लेयर की सूची में शामिल की जाती है और वह शेयर बाजार में सूचीबद्ध (Listed) नहीं है, तो उसे आरबीआई के नियमानुसार 3 साल के भीतर अनिवार्य रूप से अपना IPO लाना होता है और स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होना पड़ता है.
- कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET-1) कैपिटल का कड़ा नियम: अपर लेयर एनबीएफसी को कम से कम 9% कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET-1) कैपिटल बनाए रखना अनिवार्य है. इसका मतलब है कि कंपनी को किसी भी वित्तीय संकट से निपटने के लिए अपनी खुद की मजबूत और सुरक्षित पूँजी का बड़ा हिस्सा अलग रखना होगा.
- बोर्ड और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में बैंकों जैसा अनुशासन : इन कंपनियों में स्वतंत्र निदेशकों (Independent Directors) और महिला निदेशकों की भूमिका बेहद अहम होती है. कंपनी को एक चीफ रिस्क ऑफिसर (Chief Risk Officer – CRO) नियुक्त करना अनिवार्य होता है, जो सीधे बोर्ड को रिपोर्ट करता है. बोर्ड के सदस्यों और टॉप मैनेजमेंट के वेतन/बोनस पर भी आरबीआई की नजर रहती है.
- लार्ज एक्सपोजर फ्रेमवर्क: अपर लेयर एनबीएफसी किसी एक समूह (Group) या किसी एक कंपनी को असीमित लोन या निवेश नहीं दे सकतीं. उन पर कर्ज देने की एक सख्त सीमा (Exposure Limit) तय कर दी जाती है ताकि किसी एक डिफॉल्ट से पूरी कंपनी न डूब जाए.
- आरबीआई की सीधी और लगातार निगरानी: इन कंपनियों पर आरबीआई के इंस्पेक्टरों की सीधी नजर रहती है. इनके वित्तीय खातों की नियमित और गहन जांच (On-site & Off-site Inspection) होती है.
आरबीआई ने इतने कड़े नियम क्यों बनाए?
इन्हें वित्तीय भाषा में “Too Big to Fail” (इतने बड़े कि डूबने नहीं दिए जा सकते) की श्रेणी के करीब माना जाता है.
- आम जनता और निवेशकों के पैसे की सुरक्षा: ये कंपनियां बैंक न होते हुए भी जनता, बैंकों और म्यूचुअल फंडों से भारी मात्रा में कर्ज/पूँजी उठाती हैं.
- अर्थव्यवस्था में स्थिरता: अगर अपर लेयर की कोई कंपनी संकट में आती है, तो देश के बड़े-बड़े बैंक भी परेशानी में आ सकते हैं.
- पारदर्शिता: लिस्टिंग और कड़े खुलासों के नियमों से आम निवेशकों को कंपनी के काम-काज की सही जानकारी मिलती रहती है.
‘अपर लेयर एनबीएफसी’ का दर्जा मिलना किसी भी कंपनी के लिए सम्मान की बात तो है कि वह देश के शीर्ष वित्तीय दिग्गजों में शामिल है, लेकिन साथ ही यह जिम्मेदारी और बंदिशों का बहुत बड़ा बोझ भी लाती है. आरबीआई के इन कड़े नियमों का मुख्य उद्देश्य यही है कि भारत का वित्तीय ढांचा पूरी तरह सुरक्षित रहे और कोई भी बड़ी गैर-बैंकिंग कंपनी अपनी मनमानी या लापरवाही से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान न पहुंचा सके.
