भारतीय कॉरपोरेट जगत (India Inc) के तेजी से बढ़ते वैश्विक साम्राज्य और विदेशी निवेश पर अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय बैंक ने भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में किए जाने वाले आउटबाउंड डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) यानी विदेशी निवेश की स्क्रूटनी (जांच और निगरानी) को काफी तेज कर दिया है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारतीय कंपनियां दुनिया भर के बाजारों में पैर पसारने के लिए लगभग 34 बिलियन डॉलर का भारी-भरकम वैश्विक निवेश (Global Push) कर रही हैं. ऐसे में आरबीआई अब इस पूरे फंड फ्लो के लिए एक सख्त ‘गेटकीपर’ (पहरेदार) की भूमिका में सामने आया है.
क्यों सख्त हुआ रिजर्व बैंक?
बैंकिंग सूत्रों और नियामकीय विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई द्वारा अचानक बढ़ाई गई इस सख्ती के पीछे कई बड़े वित्तीय और आर्थिक कारण हैं:
- राउंड-ट्रिपिंग पर रोक: केंद्रीय बैंक का मुख्य फोकस इस बात पर है कि कहीं भारतीय पैसे को विदेश भेजने के बहाने, उसे वापस घुमा-फिराकर (शेल कंपनियों के जरिए) भारत के ही शेयर बाजार या रियल एस्टेट में तो नहीं लगाया जा रहा है.
- टैक्स हेवन देशों पर नजर: जिन निवेश प्रस्तावों में मॉरीशस, केमैन आइलैंड्स या ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स जैसे टैक्स हेवन देशों के जरिए रूटिंग शामिल है, उन्हें आरबीआई की बेहद बारीक जांच से गुजरना पड़ रहा है.
- FEMA नियमों का कड़ाई से पालन: फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA) के तहत विदेशी निवेश के नियमों का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित करना केंद्रीय बैंक की प्राथमिकता बन गया है.
जांच का दायरा: अब कहां फंसेगा पेच?
आरबीआई ने अधिकृत डीलर (AD) बैंकों को निर्देश दिए हैं कि वे विदेशी निवेश से जुड़े आवेदनों की केवल कागजी जांच न करें, बल्कि उनके वास्तविक उद्देश्य की भी गहराई से पड़ताल करें. अब इन तीन मोर्चों पर कंपनियों को ज्यादा जवाब देने होंगे:
- मल्टी-लेयर्ड स्ट्रक्चर: यदि कोई भारतीय कंपनी विदेश में सीधे निवेश करने के बजाय कई सब्सिडियरी या स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) बनाकर पैसा लगा रही है, तो उसकी सघन जांच की जा रही है.
- बिजनेस का वास्तविक उद्देश्य: कंपनियों को यह साबित करना होगा कि विदेशी निवेश उनके कोर बिजनेस के विस्तार के लिए है, न कि केवल फंड को कहीं और पार्क करने के लिए.
- प्रमोटर्स का ट्रैक रिकॉर्ड: निवेश करने वाली मूल भारतीय कंपनी और उसके प्रमोटर्स के वित्तीय इतिहास की भी दोबारा जांच की जा रही है ताकि किसी भी डिफॉल्ट या मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका को खत्म किया जा सके.
इंडिया इंक और डील्स पर क्या होगा इसका असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई की इस नई सतर्कता का भारतीय कॉरपोरेट जगत पर तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह का असर पड़ेगा. इस बढ़ी हुई स्क्रूटनी के कारण आने वाले समय में क्रॉस-बॉर्डर डील्स (विदेशी कंपनियों के अधिग्रहण या मर्जर) के पूरा होने के समय (Turnaround Time) में बढ़ोतरी हो सकती है. कंपनियों को अब कागजी कार्रवाई और मंजूरियों के लिए अधिक समय लेकर चलना होगा.
हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि लॉन्ग-टर्म में यह भारतीय अर्थव्यवस्था की वित्तीय स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है. इससे भारतीय कंपनियों की वैश्विक साख मजबूत होगी और वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानूनी या वित्तीय विवाद में फंसने से बची रहेंगी.
वैश्विक मंच पर भारतीय कंपनियों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन आरबीआई का यह कदम याद दिलाता है कि आक्रामक विस्तार के साथ-साथ मजबूत कॉरपोरेट गवर्नेंस और नियमों का पालन भी उतना ही अनिवार्य है. आने वाले दिनों में विदेशी निवेश की योजना बना रही कंपनियों को अपने लीगल और फाइनेंस स्ट्रक्चर को और अधिक पारदर्शी बनाना होगा.
